Saturday, August 6, 2016

कौम के नाम सन्देशः भगतसिंह

‘कौम के नाम सन्देश’ और ‘नवयुवक राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम पत्र ‘ शीर्षक के साथ मिले इस दस्तावेज के कई प्रारूप और हिन्दी अनुवाद उपलब्ध हैं, यह एक संक्षिप्त रूप है। लाहौर के पीपुल्ज़ में 29 जुलाई, 1931 और इलाहाबाद के अभ्युदय में 8 मई, 1931 के अंक में इसके कुछ अंश प्रकाशित हुए थे। यह दस्तावेज अंग्रेज सरकार की एक गुप्त पुस्तक ‘बंगाल में संयुक्त मोर्चा आंदोलन की प्रगति पर नोट’ से प्राप्त हुआ, जिसका लेखक सी आई डी अधिकारी सी ई एस फेयरवेदर था और जो उसने 1936 में लिखी थी। उसके अनुसार यह लेख भगतसिंह ने लिखा था और 3 अक्तूबर, 1931 को श्रीमती विमला प्रभा देवी के घर से तलाशी में हासिल हुआ था। सम्भवत: 2 फरवरी, 1931 को यह दस्तावेज लिखा गया। नवयुवक राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम पत्र प्रिय साथियो इस समय हमारा आन्दोलन अत्यन्त महत्वपूर्ण परिस्थितियों में से गुज़र रहा है। एक साल के कठोर संग्राम के बाद गोलमेज़ कान्फ्रेन्स ने हमारे सामने शासन-विधान में परिवर्तन के सम्बन्ध में कुछ निश्चित बातें पेश की हैं और कांग्रेस के नेताओं को निमन्त्रण दिया है कि वे आकर शासन-विधान तैयार करने के कामों में मदद दें। कांग्रेस के नेता इस हालत में आन्दोलन को स्थगित कर देने के लिए तैयार दिखायी देते हैं। वे लोग आन्दोलन स्थगित करने के हक़ में फैसला करेंगे या खि़लाफ़, यह बात हमारे लिये बहुत महत्व नहीं रखती। यह बात निश्चित है कि वर्तमान आन्दोलन का अन्त किसी न किसी प्रकार के समझौते के रूप में होना लाज़िमी है। यह दूसरी बात है कि समझौता ज़ल्दी हो जाये या देरी हो। वस्तुतः समझौता कोई हेय और निन्दा-योग्य वस्तु नहीं, जैसा कि साधारणतः हम लोग समझते हैं, बल्कि समझौता राजनैतिक संग्रामों का एक अत्यावश्यक अंग है। कोई भी कौम, जो किसी अत्याचारी शासन के विरुद्ध खड़ी होती है, ज़रूरी है कि वह प्रारम्भ में असफल हो और अपनी लम्बी ज़द्दोज़हद के मध्यकाल में इस प्रकार के समझौते के ज़रिये कुछ राजनैतिक सुधार हासिल करती जाये, परन्तु वह अपनी लड़ाई की आख़िरी मंज़िल तक पहुँचते-पहुँचते अपनी ताक़तों को इतना दृढ़ और संगठित कर लेती है और उसका दुश्मन पर आख़िरी हमला ऐसा ज़ोरदार होता है कि शासक लोगों की ताक़तें उस वक्त तक भी यह चाहती हैं कि उसे दुश्मन के साथ कोई समझौता कर लेना पड़े। यह बात रूस के उदाहरण से भली-भाँति स्पष्ट की जा सकती है। 1905 में रूस में क्रान्ति की लहर उठी। क्रान्तिकारी नेताओं को बड़ी भारी आशाएँ थीं, लेनिन उसी समय विदेश से लौट कर आये थे, जहाँ वह पहले चले गये थे। वे सारे आन्दोलन को चला रहे थे। लोगों ने कोई दर्ज़न भर भूस्वामियों को मार डाला और कुछ मकानों को जला डाला, परन्तु वह क्रान्ति सफल न हुई। उसका इतना परिणाम अवश्य हुआ कि सरकार कुछ सुधार करने के लिये बाध्य हुई और द्यूमा (पार्लियामेन्ट) की रचना की गयी। उस समय लेनिन ने द्यूमा में जाने का समर्थन किया, मगर 1906 में उसी का उन्होंने विरोध शुरू कर दिया और 1907 में उन्होंने दूसरी द्यूमा में जाने का समर्थन किया, जिसके अधिकार बहुत कम कर दिये गये थे। इसका कारण था कि वह द्यूमा को अपने आन्दोलन का एक मंच (प्लेटफ़ार्म) बनाना चाहते थे। इसी प्रकार 1917 के बाद जब जर्मनी के साथ रूस की सन्धि का प्रश्न चला, तो लेनिन के सिवाय बाकी सभी लोग उस सन्धि के ख़िलाफ़ थे। परन्तु लेनिन ने कहा, ‘'शान्ति, शान्ति और फिर शान्ति – किसी भी कीमत पर हो, शान्ति। यहाँ तक कि यदि हमें रूस के कुछ प्रान्त भी जर्मनी के ‘वारलार्ड’ को सौंप देने पड़ें, तो भी शान्ति प्राप्त कर लेनी चाहिए।'’ जब कुछ बोल्शेविक नेताओं ने भी उनकी इस नीति का विरोध किया, तो उन्होंने साफ़ कहा कि ‘'इस समय बोल्शेविक सरकार को मज़बूत करना है।'’ जिस बात को मैं बताना चाहता हूँ वह यह है कि समझौता भी एक ऐसा हथियार है, जिसे राजनैतिक ज़द्दोज़हद के बीच में पग-पग पर इस्तेमाल करना आवश्यक हो जाता है, जिससे एक कठिन लड़ाई से थकी हुई कौम को थोड़ी देर के लिये आराम मिल सके और वह आगे युद्ध के लिये अधिक ताक़त के साथ तैयार हो सके। परन्तु इन सारे समझौतों के बावज़ूद जिस चीज़ को हमें भूलना नहीं चाहिए, वह हमारा आदर्श है जो हमेशा हमारे सामने रहना चाहिए। जिस लक्ष्य के लिये हम लड़ रहे हैं, उसके सम्बन्ध में हमारे विचार बिलकुल स्पष्ट और दृढ़ होने चाहिए। यदि आप सोलह आने के लिये लड़ रहे हैं और एक आना मिल जाता है, तो वह एक आना ज़ेब में डाल कर बाकी पन्द्रह आने के लिये फिर जंग छेड़ दीजिए। हिन्दुस्तान के माडरेटों की जिस बात से हमें नफ़रत है वह यही है कि उनका आदर्श कुछ नहीं है। वे एक आने के लिये ही लड़ते हैं और उन्हें मिलता कुछ भी नहीं। भारत की वर्तमान लड़ाई ज़्यादातर मध्य वर्ग के लोगों के बलबूते पर लड़ी जा रही है, जिसका लक्ष्य बहुत सीमित है। कांग्रेस दूकानदारों और पूँजीपतियों के ज़रिये इंग्लैण्ड पर आर्थिक दबाव डाल कर कुछ अधिकार ले लेना चाहती है। परन्तु जहाँ तक देश की करोड़ों मज़दूर और किसान जनता का ताल्लुक है, उनका उद्धार इतने से नहीं हो सकता। यदि देश की लड़ाई लड़नी हो, तो मज़दूरों, किसानों और सामान्य जनता को आगे लाना होगा, उन्हें लड़ाई के लिये संगठित करना होगा। नेता उन्हें आगे लाने के लिये अभी तक कुछ नहीं करते, न कर ही सकते हैं। इन किसानों को विदेशी हुकूमत के साथ-साथ भूमिपतियों और पूँजीपतियों के जुए से भी उद्धार पाना है, परन्तु कांग्रेस का उद्देश्य यह नहीं है। इसलिये मैं कहता हूँ कि कांग्रेस के लोग सम्पूर्ण क्रान्ति नहीं चाहते। सरकार पर आर्थिक दबाव डाल कर वे कुछ सुधार और लेना चाहते हैं। भारत के धनी वर्ग के लिये कुछ रियायतें और चाहते हैं और इसलिये मैं यह भी कहता हूँ कि कांग्रेस का आन्दोलन किसी न किसी समझौते या असफलता में ख़त्म हो जायेगा। इस हालत में नौजवानों को समझ लेना चाहिए कि उनके लिये वक्त और भी सख़्त आ रहा है। उन्हें सतर्क हो जाना चाहिए कि कहीं उनकी बुद्धि चकरा न जाये या वे हताश न हो बैठें। महात्मा गाँधी की दो लड़ाइयों का अनुभव प्राप्त कर लेने के बाद वर्तमान परिस्थितियों और अपने भविष्य के प्रोग्राम के सम्बन्ध में साफ़-साफ़ नीति निर्धारित करना हमारे लिये अब ज़्यादा ज़रूरी हो गया है। इतना विचार कर चुकने के बाद मैं अपनी बात अत्यन्त सादे शब्दों में कहना चाहता हूँ। आप लोग इंकलाब-ज़िन्दाबाद (long live revolution) का नारा लगाते हैं। यह नारा हमारे लिये बहुत पवित्र है और इसका इस्तेमाल हमें बहुत ही सोच-समझ कर करना चाहिए। जब आप नारे लगाते हैं, तो मैं समझता हूँ कि आप लोग वस्तुतः जो पुकारते हैं वही करना भी चाहते हैं। असेम्बली बम केस के समय हमने क्रान्ति शब्द की यह व्याख्या की थी – क्रान्ति से हमारा अभिप्राय समाज की वर्तमान प्रणाली और वर्तमान संगठन को पूरी तरह उखाड़ फेंकना है। इस उद्देश्य के लिये हम पहले सरकार की ताक़त को अपने हाथ में लेना चाहते हैं। इस समय शासन की मशीन अमीरों के हाथ में है। सामान्य जनता के हितों की रक्षा के लिये तथा अपने आदर्शों को क्रियात्मक रूप देने के लिये – अर्थात् समाज का नये सिरे से संगठन कार्ल माक्र्स के सिद्धान्तों के अनुसार करने के लिये – हम सरकार की मशीन को अपने हाथ में लेना चाहते हैं। हम इस उद्देश्य के लिये लड़ रहे हैं। परन्तु इसके लिये साधारण जनता को शिक्षित करना चाहिए। जिन लोगों के सामने इस महान क्रान्ति का लक्ष्य है, उनके लिये नये शासन-सुधारों की कसौटी क्या होनी चाहिए? हमारे लिये निम्नलिखित तीन बातों पर ध्यान रखना किसी भी शासन-विधान की परख के लिये ज़रूरी है - शासन की ज़िम्मेदारी कहाँ तक भारतीयों को सौंपी जाती है? शासन-विधान को चलाने के लिये किस प्रकार की सरकार बनायी जाती है और उसमें हिस्सा लेने का आम जनता को कहाँ तक मौका मिलता है? भविष्य में उससे क्या आशाएँ की जा सकती हैं? उस पर कहाँ तक प्रतिबन्ध लगाये जाते हैं? सर्व-साधारण को वोट देने का हक़ दिया जाता है या नहीं? भारत की पार्लियामेन्ट का क्या स्वरूप हो, यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। भारत सरकार की कौंसिल आफ़ स्टेट सिर्फ अमीरों का जमघट है और लोगों को फाँसने का एक पिंजरा है, इसलिये उसे हटा कर एक ही सभा, जिसमें जनता के प्रतिनिधि हों, रखनी चाहिए। प्रान्तीय स्वराज्य का जो निश्चय गोलमेज़ कान्फ्रेन्स में हुआ, उसके सम्बन्ध में मेरी राय है कि जिस प्रकार के लोगों को सारी ताकतें दी जा रही हैं, उससे तो यह ‘प्रान्तीय स्वराज्य’ न होकर ‘प्रान्तीय जु़ल्म’ हो जायेगा। इन सब अवस्थाओं पर विचार करके हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि सबसे पहले हमें सारी अवस्थाओं का चित्र साफ़ तौर पर अपने सामने अंकित कर लेना चाहिए। यद्यपि हम यह मानते हैं कि समझौते का अर्थ कभी भी आत्मसमर्पण या पराजय स्वीकार करना नहीं, किन्तु एक कदम आगे और फिर कुछ आराम है, परन्तु हमें साथ ही यह भी समझ लेना कि समझौता इससे अधिक भी और कुछ नहीं। वह अन्तिम लक्ष्य और हमारे लिये अन्तिम विश्राम का स्थान नहीं। हमारे दल का अन्तिम लक्ष्य क्या है और उसके साधन क्या हैं – यह भी विचारणीय है। दल का नाम ‘सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी’ है और इसलिए इसका लक्ष्य एक सोशलिस्ट समाज की स्थापना है। कांग्रेस और इस दल के लक्ष्य में यही भेद है कि राजनैतिक क्रान्ति से शासन-शक्ति अंग्रेज़ों के हाथ से निकल हिन्दुस्तानियों के हाथों में आ जायेगी। हमारा लक्ष्य शासन-शक्ति को उन हाथों के सुपुर्द करना है, जिनका लक्ष्य समाजवाद हो। इसके लिये मज़दूरों और किसानों केा संगठित करना आवश्यक होगा, क्योंकि उन लोगों के लिये लार्ड रीडिंग या इरविन की जगह तेजबहादुर या पुरुषोत्तम दास ठाकुर दास के आ जाने से कोई भारी फ़र्क न पड़ सकेगा। पूर्ण स्वाधीनता से भी इस दल का यही अभिप्राय है। जब लाहौर कांग्रेस ने पूर्ण स्वाधीनता का प्रस्ताव पास किया, तो हम लोग पूरे दिल से इसे चाहते थे, परन्तु कांग्रेस के उसी अधिवेशन में महात्मा जी ने कहा कि ‘'समझौते का दरवाज़ा अभी खुला है।'’ इसका अर्थ यह था कि वह पहले ही जानते थे कि उनकी लड़ाई का अन्त इसी प्रकार के किसी समझौते में होगा और वे पूरे दिल से स्वाधीनता की घोषणा न कर रहे थे। हम लोग इस बेदिली से घृणा करते हैं। इस उद्देश्य के लिये नौजवानों को कार्यकर्ता बन कर मैदान में निकलना चाहिए, नेता बनने वाले तो पहले ही बहुत हैं। हमारे दल को नेताओं की आवश्यकता नहीं। अगर आप दुनियादार हैं, बाल-बच्चों और गृहस्थी में फँसे हैं, तो हमारे मार्ग पर मत आइए। आप हमारे उद्देश्य से सहानुभूति रखते हैं, तो और तरीकों से हमें सहायता दीजिए। सख़्त नियन्त्रण में रह सकने वाले कार्यकर्ता ही इस आन्दोलन को आगे ले जा सकते हैं। ज़रूरी नहीं कि दल इस उद्देश्य के लिये छिप कर ही काम करे। हमें युवकों के लिये स्वाध्याय-मण्डल (study circle) खोलने चाहिए। पैम्फ़लेटों और लीफ़लेटों, छोटी पुस्तकों, छोटे-छोटे पुस्तकालयों और लेक्चरों, बातचीत आदि से हमें अपने विचारों का सर्वत्र प्रचार करना चाहिए। हमारे दल का सैनिक विभाग भी संगठित होना चाहिए। कभी-कभी उसकी बड़ी ज़रूरत पड़ जाती है। इस सम्बन्ध में मैं अपनी स्थिति बिलकुल साफ़ कर देना चाहता हूँ। मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ, उसमें गलतफ़हमी की सम्भावना है, पर आप लोग मेरे शब्दों और वाक्यों का कोई गूढ़ अभिप्राय न गढ़ें। यह बात प्रसिद्ध ही है कि मैं आतंकवादी (terrorist) रहा हूँ, परन्तु मैं आतंकवादी नहीं हूँ। मैं एक क्रान्तिकारी हूँ, जिसके कुछ निश्चित विचार और निश्चित आदर्श हैं और जिसके सामने एक लम्बा कार्यक्रम है। मुझे यह दोष दिया जायेगा, जैसा कि लोग राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ को भी देते थे कि फाँसी की काल-कोठरी में पड़े रहने से मेरे विचारों में भी कोई परिवर्तन आ गया है। परन्तु ऐसी बात नहीं है। मेरे विचार अब भी वही हैं। मेरे हृदय में अब भी उतना ही और वैसा ही उत्साह है और वही लक्ष्य है जो जेल के बाहर था। पर मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि हम बम से कोई लाभ प्राप्त नहीं कर सकते। यह बात हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के इतिहास से बहुत आसानी से मालूम हो जाती है। केवल बम फेंकना न सिर्फ़ व्यर्थ है, अपितु बहुत बार हानिकारक भी है। उसकी आवश्यकता किन्हीं ख़ास अवस्थाओं में ही पड़ा करती है। हमारा मुख्य लक्ष्य मज़दूरों और किसानों का संगठन होना चाहिए। सैनिक विभाग युद्ध-सामग्री को किसी ख़ास मौके के लिये केवल संग्रह करता रहे। यदि हमारे नौजवान इसी प्रकार प्रयत्न करते जायेंगे, तब जाकर एक साल में स्वराज्य तो नहीं, किन्तु भारी कुर्बानी और त्याग की कठिन परीक्षा में से गुज़रने के बाद वे अवश्य ही विजयी होंगे। इंकलाब-ज़िन्दाबाद! (2 फरवरी,1931)

तबाही-बर्बादी के 25 साल

1990 में देश के तत्कालीन प्रधनमंत्राी चंद्रशेखर ने देश का सोना गिरवी रख था। तब उन्होंने पफरमाया था कि ‘देश के विकास के लिए जनता को पेट पर पट्ट्टी बांध्नी होगी।’ यह वह संकेत था, जिस सिलसिले की शुरुआत 1991 में नर्सिंहाराव-मनमोहन सिंह की सरकार ने की, जो आज एक भयावह रूप ले चुका है। आइए इस विकास यात्रा को देखें। जमीन 1980 से तैयैयार हुई निजीकरण, छंटनी, बेरोजगारी, महंगाई व लम्बे संघर्षों के दौरान मिले श्रम कानूनी अधिकारों को किश्तों में छीनने का सिलसिला तो 1980 के दशक से ही शुरू हो गया था, जबसे देश में विदेशी पूँजी की घुसपैठ बढ़नी शुरू हुई है। सार्वजनिक कम्पनियों को खत्म करने के लिए 1981-82 में वित्तीय एवं औद्योगिक पुनर्गठन बोर्ड ;बीएपफआईआरद्ध का गठन और सार्वजनिक क्षेत्रा के 58 उद्योगों ;लगभग साढ़े तीन सौ कारखानोंद्ध को फ्बीमारय् घोषित करने का काम शुरू हुआ। इसी के साथ उद्योगों में 49 फीसदी तक विदेशी पूँजी लगाने का सिलसिला शुरू हुआ। मारुति सुजुकी, हीरोहोण्डा, कावासाकी बजाज, इण्ड सुजुकी, श्री राम होण्डा जनरेटर, बिरला यामहा आदि देशी-विदेशी उद्यम संयुक्त भागेदारी के साथ लगने शुरू हुए। और यहाँ से शुरू हुआ सार्वजनिक कम्पनियों को बेचने, छंटनी-तालाबन्दी, श्रम अध्किारों में कटौती का सिलसिला। हलांकि तब मज़दूर आन्दोलन का दबाव होने के कारण यह गति धीमी थी। 25 साल पहले, 1991 में नर्सिंहा राव व मनमोहन सिंह की जोड़ी ने देश की मेहनतकश जनता के ऊपर एक नया हमला बोला था। उदारीकरण, वैश्वीकरण, निजीकरण का जो सिलसिला शुरू किया उससे ऊपर के 10 पफीसदी अमीरजादों के लिए खुशहाली बढ़ती गयी। अरबपति खरबपति होते गये और मेहनतकश जनताकी बदहाली और बढ़ती गयी। 1991 में नर्सिंहा राव-मनमहोन सिंह की सरकार ने देश को वैश्विक बाजार की शक्तियों के हवाले करते हुए जनता के खून-पसीने से खड़े सार्वजनिक उपक्रम को बेचने के साथ मज़दूर अध्किारों को छीनने का काम तेज किया। गैट समझौते के बाद 1995 में विश्व व्यापार संगठन ;डब्लूटीओ का हिस्सा बनकर देश की आम जनता की गुलामी का एक नया दौर शुरू हुआ। 25 साल पूर्व नयी नीतियों पर भाजपा का विरोध् सबसे तेज था। स्वदेशी और मंदिर-मस्जिद की राजनीति ने भाजपा को केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया। गांव गांव में यह संदेश दिया जाने लगा कि राव सरकार देश को दूसरी गुलामी की ओर ले जा रहे हैं। परिणाम ये हुआ कि 1995 के चुनाव में कांग्रेस की हार हुई और गुजराल व देवेगौड़ा की वामपंथियों से युक्त संयुक्त मोर्चे की सरकारें बनी। ‌बाजपेयी के नेतृत्व में कई दलों को मिलाकर एनडीए की सरकार बनी, लेकिन विरोध् की राजनीति पर चुनाव जीती भाजपा सरकार ने आते ही पिछली सरकार की नीतियों को ही आगे बढ़ाया। करीब 7 साल तक भाजपा नीत एनडीए की सरकार रही और बीमा क्षेत्रा में निजीकरण के साथ उदारीकरण ने गति पकड़ी। बाजपेयी की भाजपा नीत सरकार के दौर में सबसे खतरनाक मज़दूर विरोध्‍ाी द्वितीय श्रम आयोग की रिपोर्ट आई। ‘हायर एण्ड फायर’ उसी की देन है। जहाँ कोई श्रम कानून लागू न हो, ऐसे ‘विशेष आर्थिक क्षेत्रा’ ;सेज परियोजनाओं ने गति पकड़ी। 2005 में मनमोहनी सरकार ने मालिकों के हित में श्रम कानूनों को बदलने की कोशिश की लेकिन व्यापक विरोध में तब वह पारित नहीं हो सका था। लेकिन बैक डोर से मालिकों को खुली छूट दी जाती रही। निजीकरण, छंटनी, बन्दी का सिलसिला आगे बढ़ता रहा। खाद्य पदार्थों को भी वायदा करोबार के नाम पर सट्टा बाजार के हवाले करना शुरू हुआ। मोदेदी और ‘सुधार’ का दूसरा दौर 2014 के चुनाव में मोदी की रणनीति के सामने कांग्रेस धराशायी हो गई। मोदी के सत्तासीन होने के बाद उदारीकरण के दूसरे दौर की शुरुआत हो गयी। मनमोहन सिंह की नीति उनके लिए आज मील का पत्थर है। ‘मेक इन इण्डिया’, डिजिटल इण्डिया’, ‘स्किल इण्डिया’, ‘स्टार्टअप इण्डिया’ जैसे नारों के बीच देशी-विदेशी लूट का सिलसिला गति पकड़ रहा है। कुल मिलाकर मालिक पक्षीय श्रमसुधारों की आंधी पूँजीपतियों की आक्रामकता की पटकथा लिख रही है। यूनियन बनाने में बाधा खड़ा करने, गैरकानूनी ठेकेदारी में सारे कामों को झोंकने, मज़दूरों की मनमानी छंटनी, सुविधाओं में कटौती और बगैर सुरक्षा खतारनाक परिस्थितियों में खटाने का सिलसिला आगे बढ़ता रहा। निजीकरण ने तेज रफ्रतार पकड़ी। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की घुसपैठ और तेज हुई। पेट्रोल, डीजल खुले बाजार के हवाले हो गया। खुदरा बाजार में विदेशी घुसपैठ के लिए एपफडीआई पारित हो गया। दनादन पफैसलों की कड़ी में सार्वजनिक क्षेत्रा की कम्पनियों में विनिवेश ;निजी हाथों में बेंचनेद्ध की मंजूरी शामिल है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाकर विदेशी पूँजी की घुसपैठ और लूट तेज होती गयी। ठेकाकरण, अनौपचारीकरण, सामाजिक-आर्थिक-रोजगार में कटौती का दौर पिछले ढ़ाई दशक से लगातार जारी है और तेज होता जा रहा है। मज़दूरों पर पूँजीपतियों तथा केन्द्र व राज्य सरकारों और उसके सभी अंगों का दमन लगातार बढ़ता जा रहा है। विरोध के हर स्वर को कुचलने के लिए श्‍ाासन-प्रशासन -श्रम विभाग-पुलिस-न्यायपालिका एक टांग पर मालिकों के हित में खड़ी हैं। 25 साल पहले तत्कालीन वित्तमंत्राी मनमोहन सिंह ने कहा था कि सुधरों का यह सिलसिला एक ऐसी धारा है, जिसके प्रवाह को मोड़ा नहीं जा सकता। तबसे अब तक लगभग सभी पार्टियाँ मनमोहन सिंह की इस बात को ही सही साबित करने में जुटी रही हैं। नरेन्द्र मोदी इस सिलसिले के सबसे नये अवतार हैं। मुकुल, संपादक मेहनतकश्‍ा

Wednesday, February 17, 2016

युग-पलटने में मशरूफ़ लोग कैसे मरते हैं? - दलजीत अमी

रोहित वेमुला के बाद नवकरन की आत्महत्या दुखद है। नवकरन की आत्महत्या एक तरफ़ तो आत्महत्याओं के रुझान की एक कड़ी है पर दूसरी तरफ़ उसकी पहचान के साथ जुड़ कर आत्महत्याओं के जटिल पहलू को उजागर करती है। नवकरन एक कम्युनिस्ट धड़े (रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट लीग आफ इंडिया या आरसीएलआई) का पूर्णकालिक कार्यकर्ता था। उसकी उम्र 22 साल की थी। रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद पंजाब यूनिवर्सिटी में हुए रोष प्रदर्शन की तस्वीरें फेसबुक पर नवकरन की आ‌खिरी पोस्ट थी। जब रोहित वेमुला के आखिरी खत की चर्चा चल रही है तो इसी दौरान नवकरण ने अपनी जिन्दगी का आखिरी खत लिखा है। रोहित वेमुला की तरह नककरन भी अपने खत में किसी को मुखातिब नहीं और और अन्त में उसने अपना नाम नहीं लिखा। यह खत पढ़ना दर्दनाक है पर यह हमारे समय के युग पलटने निकले नौजवान ने लिखा है इसलिए पढ़ना ज़रूरी है। टुकड़ों में लिखे इस खत की नकल इस तरह है। शायद मैं ऐसा फैसला बहुत पहले ले चुका होता लेकिन जो चीज़ मुझे यह करने से रोक रही थी वह मेरी कायरता थी . . . और वह पल आ गया जिस पल की अटलता के बारे में मुझे शुरू से ही भरोसा था पक्का और दृढ़ भरोसा। लेकिन अपने भीतर दो चीजों को सम्भालते हुए अब मैं थक चुका हूँ। जिन लोगों के साथ मैं चला था मुझमें उन जैसी अच्छाई नहीं शायद इसीलिए मैं उनका साथ नहीं निभा पाया। दोस्तो मुझे माफ कर देना और एक छोटी सी प्यारी सी रूह से भी मैं माफ़ी माँगता हूँ... मुझे माफ कर देना मेरी प्यारी . . . . . मैं भगोड़ा हूँ लेकिन गद्दार नहीं. . .अलविदा. मैं यह फैसला अपनी खुद की कमज़ोरी की वजह से ले रहा हूँ। मेरे लिए अब करने के लिए इससे बेहतर काम नहीं है। हो सके तो मेरे बारे में सोचना तो जरा रियायत से इस खत के शब्दों में बहुत स्पेस है जो पाठक को परेशान करती है। कुछ शब्दों के अर्थ तो उससे रोज़ाना संपर्क में रहने वालों की समझ में आ सकते हैं। खत बताता है कि वह अपने साथियों जैसी ‘अच्छाई’ न होने के कारण उनसे ‘निभा नहीं पाया’ और ‘थक’ जाने के कारण इस फैसले को टालता रहा पर आखिर वह ‘अटल’ पल आ गया, जब उसने अपनी ‘कायरता और कमज़ोरी’ की जगह मौत को तवज्जो दी। खत के शब्दों के बीच में स्पेस के अलावा इस में नवकरन के व्यक्तित्व का एक पहलू बहुत साफ़ झलकता है। वह बहुत संभल-संभल के लिख रहा है। एक सवाल तो सपष्ट ही उठता है कि वह जिस माहौल में जी रहा है, उसमें उसको ‘भगोड़ा’ और ‘गद्दार’ शब्दों का इस्तेमाल कैसे होता है? रोहित वेमुला के खत पर बहुत चर्चा हो रही है। नवकरन का खत रोहित वेमुला के ही खत की एक और रीडिंग से पर्दा उठाता है। दरअसल इन दोनों खतों की सांझी तार इन दोनों का सक्रिय कार्यकर्ता होना है। रोहित ‘अपने अम्बेडकर स्टूडेंट एसोसिएसन के परिवार को निराश करने के लिए माफी मांगता’ है और नवकरन अपने साथियों से मौत के बाद ‘ज़रा रियायत से सोचने’ की मांग करता है। रोहित लिखता है “लोग मुझे डरपोक करार दे सकते हैं। मेरे जाने के बाद मुझे खुदगर्ज़ या मूर्ख करार दिया जा सकता है। मैंने इस बात की परवाह नहीं की कि कोई बाद में मुझे क्या कहेगा”। नवकरन लिखता है “मैं भगोड़ा हूं गद्दार नहीं”। रोहित अपनी हालत बयां करता है “मैं दुखी नहीं हूं। मैं उदास नहीं हूं। मैं खाली हूं। बिलकुल खाली अपने-आप से बेख़बर। यहीं दुःख है। इसी वजह से मैं विदा होता हूं”। नवकरन इसी राइट अप का अगला वाक्य लिखता मालूम पड़ता है, “मैं ऐसा फैसला बहुत पहले ले चुका होता लेकिन जो चीज़ मुझे यह करने से रोक रही थी वह मेरी कायरता थी . . . और वह पल आ गया जिस पल की अटलता के बारे में मुझे शुरू से ही भरोसा था पक्का और दृढ़ भरोसा”। इन दोनों खतों को एक ही दौर के सक्रिय कार्यकर्ताओं ने लिखा है। दोनों अंतिम समय तक अपने संगठनों के सक्रिय कार्यकर्ता थे। दोनों युग बदलने में मशरूफ़ थे। युग पलटने से बेहतर सपना या जीने का कारण और क्या हो सकता है? युग पलटने का सपना प्यार से लबरेज़ व्यक्तियों को ही आता है। उनमें से ज्यादा हिम्मत वाले पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनते हैं। यह बात तो व्यवस्था विरुद्ध चलने वाले, युग पलटने वाले सारे आंदोलनों के बाबत मानी जाती है कि पूर्णकालिक कार्यकर्ता समाज की मलाई होते हैं। यह सवाल अपनी जगह है कि इस धारणा को पेश करने की राजनीति क्या है? जब कोई संगठन या कोई आंदोलन युग पलटने या व्यवस्था परिवर्तन का दावा करता है तो उसकी एक सीमा होती है। उस संगठन या आंदोलन को भले ही समूची व्यवस्था को बदलने में कामयाबी न मिले, पर उसका सिक्का कहीं तो चलता है। पूर्णकालिक कार्यकर्ता पर तो उनका सिक्का चलता है। अगर पूर्णकालिक कार्यकर्ता पर मौजूदा व्यवस्था का असर मायने रखता है, तो संगठनों की हुकूमत भी मायने रखती है। नए समाज के सृजन का सपना एक सोच के व्यक्तियों के आपसी व्यवहार में से नक्श निखारता है। यह सवाल मायने रखता है कि युग पलटने का सपना मौजूदा व्यवस्था के पतन के शिकार हुए इंसान का इलाज कैसे करता है? युग पलटने की हामी भरने वाले संगठनों और आंदोलनों की यह खांटी दलील है कि इंसान को ज़लालत के रास्ते पर चलने की बजाए बगावत के रास्ते पर चलना चाहिए। पिछले सालों में यह दलील लगातार दी गयी है कि बदहाली के कारण आत्महत्याओं की बजाय लोगों को लामबंद होना चाहिए, संगठित होना चाहिए और संघर्ष करना चाहिए। लामबंदी इंसान को संवेदना से सौन्दर्य के रास्ते पर ले जाती है। यह इंसान को अहसास करवाती है कि उसकी दुश्‍वारियों का कारण व्यक्तिगत नाकामयाबियों या माथे पर लिखी तकदीर नहीं बल्कि व्यवस्था है। यह सोच इंसान की इंसान के साथ सांझ पैदा करती है। व्यक्ति को प्यार से लबरेज़ करती है और सयुक्त प्रयासों को अहमियत देती है। यह मनुष्य को सामाजिक दुश्‍वारियों को शर्म, सलीके या पर्दे में ढक के रखने की जगह उसको एक सामाजिक जीव की तरह व्यवहार करने की सूझ देती है। यह सवाल अपनी जगह पर अहम है कि इन वादों/दावों और कारगुज़ारियों में कितना फासला है? रोहित और नवकरण की आत्महत्याएं इन दावों के निरीक्षण की मांग करती है। अगर रोहित धरने से जाकर आत्महत्या करता है तो यह सवाल तो उसके साथियों के दिलो-दिमाग में आना चाहिए कि व्यवस्था के शून्य किये गये में ‘युग पलटने का सपना’ ज़रूरी गर्मी भरने में नाकामयाब क्यों रहा? युग पलटने के लिए मशरूफ़ संगठन ‘खाली हो कर चल दिये साथी’ के शोक में अपनी नाकामयाबी को क्यों नहीं पहचानते? अगर व्यवस्था ‘युग पलटने के सपने लेने वालो व्यक्तियों’ का दम घोंटने पर उतारू है, तो ‘युग पलटने में मशरूफ़ लोग’ अपने साथियों के दिलों की धड़कन सुनने के समय मशीनें क्यों बन जाते हैं। मौजूदा व्यवस्था की दलील रहती है कि इन आत्महत्याओं के कारण निज़ी हैं। व्यवस्था खुद-ब-खुद हत्यारे को परिधि में से निकालने का यत्न इसी दलील के सहारे करती है। दूसरी तरफ़ ‘युग पलटने का दावा/वादा करने वाले संगठनों और लोग’ हर सवाल को गद्दारी और कुत्सा प्रचार या प्रतिक्रांतिकारी करार देते हैं। इसी के परिणामस्वरूप जब ‘युग पलटने में मशरूफ़ लोगों’ का मोहभंग होता है तो वह ‘युग पलटने के हर यत्न’ से मुंह फेर लेते हैं। वह अपने अनुभवों के हवाले से इन यत्नों के बेमायने होने के प्रचारक तक बन जाते हैं। अगर रोहित बाबत सवाल पूछने पर मौजूदा व्यवस्था देशद्रोही या नक्सलवादी या हिंदू विरोधी करार देती है, तो सवाल वाज़िब है। अगर रोहित और नवकरन बाबत पुछे गए सवालों को ‘युग पलटने में मशरूफ़ लोग कुत्सा प्रचार या गद्दारी करार देते हैं तो यह सवाल बार-बार पूछे जाने बनते हैं। अगर ‘युग पलटने में मशरूफ़ लोग’ बुखार से नहीं मरते तो निरीक्षण से भी नहीं मरने लगे। संघर्षत रहे रोहित वेमुला को अपने साथियों को अपने साथियों के संग अपना जीवन क्यों खाली लगता था/है? नवकरन को आत्महत्या के मामले में पक्का और दृड़ भरोसा क्यों था/है? (दलजीत अमी डाट काम से अनुवादित) सबंधित लिंक-http://daljitami.com/2016/02/09/suicide-by-a-communist-whole-timer-daljit-ami/

Friday, December 18, 2015

लम्बे संघर्ष के बाद महिन्द्रा सीआईई मज़दूरों की जीत

रुद्रपुर (ऊधम सिंह नगर)। महिन्द्रा ग्रुप की आॅटोपार्ट निर्माता महिन्द्रा सीआईई के मज़दूरों का संघर्ष रंग लाया। सहायक श्रमायुक्त ऊधम सिंह नगर की मध्यस्तता में 11 दिसम्बर की देर रात्रि तक चली वार्ता के बाद दो बर्खास्त श्रमिकों हेम चंद और दीपक सिंह कार्की की बिना शर्त कार्यबहाली और 8 फीसदी वेतन बृद्धि का समझौता हो गया। वेतन बृद्धि 1 जनवरी, 2016 से एक वर्ष के लिए हुआ है। समझौते के तहत प्रबन्धन प्रतिशोधवश मज़दूरों पर कोई उत्पीड़नात्मक कार्यवाही नहीं करेगा। मज़दूरों को कोई अंडरटेकिंग भी नहीं देना पड़ा।
उल्लेखनीय हैं कि डेढ़ साल पूर्व 20 अगस्त, 2014 को मज़दूरों ने कम्पनी प्रबन्धन को एक माँग पत्र दिया था, जिसके प्रतिशोधवश प्रबन्धन ने श्रमिक प्रतिनिधि हेम चंद व दीपक सिंह को पहले निलम्बित फिर बर्खास्त कर दिया था। इस बीच सहायक श्रमायुक्त के लिखित समझौते व एसडीएम के समक्ष सहमति के बावजूद कार्यबहाली नही हुई थी। श्रम विभाग व प्रशासन भी अपने वायदे से मुकर गया था। खुद पूर्ववर्ती डीएम ने केवल एक को काम पर लेने की धमकी दी थी, तो नये डीएम ने धरना उखाड़ने की धमकी दी। लेकिन महिन्द्रा सीआईई के श्रमिक अवैध रूप से बर्खास्त दो श्रमिकों की कार्यबहाली और माँगपत्र के समाधान के लिए 69 दिनों तक डीएम परिसर में धरनारत रहे।
महज 38 स्थाई श्रमिकों की ताकत पर मज़दूरों ने काफी सूझ-बूझ भरे कदम उठाए। मजदूरों ने महिन्द्रा सीआईई के जिले में स्थित लालपुर प्लाण्ट के मजदूरों से एकता बनाई और वहाँ के मज़दूरों ने भी अपना माँगपत्र लगाया, जिसमें दोनो की कार्यबहाली की भी माँग उठाई। दूसरी तरफ उन्होंने इलाके की तमाम यूनियनों को भी लामबन्द किया और अपनी माँग के साथ वीएचबी, मित्तर फाॅस्टनर, पारले व डेल्फी टीविएस के श्रमिक उत्पीड़न के विरुद्ध 14 दिसम्बर को मज़दूर पंचायत बुलाई। इससे प्रशासन और प्रबन्धन दोनों पर दबाव बन गया। यूनियनों की साझा संघर्ष की घोषणा के तत्काल बाद आनन-फानन में डीएम ने वार्ता बुलाकर प्रबन्धन पर दबाव बनाया और एएलसी से दो दिनों में समाधान निकालने का निर्देश दिया। इन स्थितियों में महिन्द्रा सीआईई के मजदूरों की जीत हुई। इससे अन्य मज़दूरों के संघर्ष को भी दम मिला है और उनका संघर्ष भी तेज होने लगा है।
इस संघर्ष में एक ऐसे वक्त में कामयाबी मिली है, जब मज़दूरों पर लगातार हमले जारी हैं। आज के दौर में एक बार बर्खास्त होने के बाद कार्यबहाली बेहद मुश्किल भरा काम हो चुका है। ऐसे में बगैर यूनियन के महज 38 श्रमिकों की ताकत पर 16 महीने तक बगैर थके संघर्ष चलाकर इस मुकाम तक पहुँचना बेहद अहम है। एक और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अभी इस इलाके में पिछले दिनों मजदूरों को जो थोड़ी बहुत जीत अपने संघर्षों के दम पर मिली है, उसका श्रेय नेता लूटते रहे हैं। इस आन्दोलन में सहयोग मजदूरों ने सबका लिया, लेकिन जीत का श्रेय किसी चुनावी नेता को नहीं अपितु खुद मजदूरों के एकताबद्ध संघर्ष को ही मिला है।
संघर्षरत रहे मजदूरों ने इलाके की यूनियनों के नाम जारी धन्यवाद पत्र में कहा है कि इस छोटी सी अहम जीत ने आगे के कठिन लम्बे संघर्ष के लिए हमें जो ताकत दी है, वह ज्यादा महत्वपूर्ण है। इससे हममें संघर्ष से जीत की एक नयी उम्मीद पैदा हुई है।

Sunday, October 11, 2015

मजदूरों की लाश पर कंस्ट्रकशन

                                       सुनील कुमार
सभी की चाहत होती है कि उसका एक अपना घर हो। लोग रोजगार की तलाश मंे महानगरों और बड़े शहरों की ओर भाग रहे हैं जिससे कुछ शहरों की आबादी में बेतहासा वृद्धि हो रही है। यही कारण है कि महानगरों में ज्यादा लोग किराये के मकान में रहते हैं। इस का सबसे ज्यादा फायदा रीयल एस्टेट को हो रहा है। इसी कारण दिल्ली, मुम्बई, बंगलोर जैसे शहरों में एक फ्लैट की कीमत इतनी ज्यादा है कि जनता की पूरी जीवन की कमाई रहने के लिए एक घरौंदा बनाने में चली जाती है। रीयल एस्टेट में बहुत से कारपारेट घराने, राजनीतिज्ञ और अफसरशाह अपनी काली कमाई (ब्लैक मनी) को लगा कर कई गुना मुनाफे कमाते हैं। दिल्ली एन.सी.आर. में काफी बड़ी संख्या में अपार्टमेंट का निर्माण किया जा रहा है जिसमंे करीब 150 से अधिक बिल्डर लगे हुये हैं।

मुनाफा मजदूरों के खून पर
बिल्डर काम जल्दी पूरा करने के लिए छोट-छोटे ठेकदारों को अलग-अलग काम दिये रहते हैं। मजदूरों से दिन-रात काम करवाये जाते हैं। मजूदरों की सुरक्षा पर किसी तरह का ध्यान नहीं दिया जाता है। किसी भी साईट पर मजदूरों की संख्या के हिसाब से हेलमेट, सेफ्टी बेल्ट, जूते, ग्लव्स नहीं होते हैं। दिखाने के लिए कुछ हेलमेट, जूते, बेल्ट तो दिखते हैं लेकिन यह संख्या मजदूरों की संख्या से कम होती है। कोई भी दुर्घटना होने पर उसके बचाव की कोई व्यवस्था नहीं होती या ऐसी व्यवस्था होती है जो दुर्घटना को और बढ़ावा देती है। लेकिन बिल्डरों के पास ऐसी टीम जरूर होती है जो मजदूरों को डरा-धमका सके, दुर्घटना होने पर लाश गायब करे और फर्जी मजदूर बनकर मीडिया के सामने बिल्डर के पक्ष में बयान दे सके। मजदूरों के खून-पसीने का पैसे ये बिल्डर डकार जाते हैं और उसी के कुछ हिस्से देकर शासन-प्रशासन को खरीद लेते हैं। बदले में यह शासन-प्रशासन दुर्घटना और पर्यावरण के नुकसान होने पर बिल्डर को बचाने का काम करते हैं। बिल्डर मजदूरों को ही नहीं, घर का सपना संजोये लोगों को भी धोखा देते हैं। उसको समय से घर मुहैय्या नहीं कराते हैं या लागत बढ़ने के नाम पर पैसे बढ़ा दते हैं। ऐसी ही कुछ घटनाएं सामने आई हैं। 

साथी मर गया, पुलिस ने दौड़ा-दौड़ा कर पीटा
नोएडा सेक्टर 75 में तीन-चार साल से कंस्ट्रकशन का काम चल रहा है। इस कंस्ट्रकशन साइट पर कई बिल्डर हैं जिनका काम बिल्डिंग बनाने से लेकर सीवर डालना, टायल लगाना, शीशे लगना इत्यादि है। इस साइट पर कितने मजदूर काम कर रहे हैं इसका अनुमान लगाना किसी के लिए भी कठिन काम है। बहुत सारे मजदूर साइट पर ही बने दरबेनुमा अस्थायी झोपड़ में रहते हैं। इस झोपड़ की उंचाई 6 फीट और उसके ऊपर टीन की छत होती है। इसी छत के नीचे उनको मई-जून के 45 डिग्री तापमान में भी परिवार के साथ रहना पड़ता है। इन झोपड़ों में इनके पास कुछ बर्तन और एक पुराने पंखे के अलावा कुछ नहीं होता। सोने के लिए टाट, तो बैठने के लिए ईंट का इस्तेमाल करते हैं। कुछ मजदूर साइट के बाहर किराये के रूम में 4-5 के ग्रुप में रहते हैं।
ये सभी मजदूर रोज की तरह 4 अक्टूबर, 2015 को भी नियत समय से काम पर लगे हुए थे। मुरादाबाद के याकूब और अन्य मजदूर एम्स मैक्स गारडेनिया डेवलपर्स प्रा. लि. के अन्तर्गत काम कर रहे थे, जिनका काम था सीवर लाईन को बिछाना। याकूब दो मजदूर के साथ बीस फीट गहरे में उतरकर पाईप डालने के लिए मिट्टी समतल करने का काम कर रहे थे। सेफ्टी के लिए किसी तरह का जाल या मिट्टी रोकने के लिए कोई चादर नहीं लगाया गया था। मिट्टी भी बलुठ (दोमट मिट्टी) थी, जिससे वह अचानक काम कर रहे याकूब और उसके साथी पर गिर पडी। दूसरे छोर पर काम कर रहा एक मजदूर तो बच गया लेकिन याकूब और उसके एक साथी मिट्टी में दब गये। मजदूरों ने इकट्ठे होकर शोर मचाया और बचाने का प्रयास किया। वहीं पर गड्ढे खोदने के लिए जे.सी.बी मशीन से याकूब को निकाला गया। लेकिन बचाव के लिये आई इस मशीन से याकूब के सिर और शरीर पर जख्म हो गये। याकूब को अस्पताल ले जाया गया जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। मजूदरों ने हंगामा किया तो पुलिस ने उनको खदेड़-खदेड़ कर पीटा। एम्स मैक्स गारडेनिया डेवलपर्स प्रा. लि. के कारिन्दे मजदूरों और सुपरवाईजरों को गाड़ी में बैठा कर कहीं छोड़ आये। घटना-स्थल पर एक बुर्जुग मजदूर डटा रहा और लगातार मांग करता रहा कि इसमें एक और मजदूर दबा है उसे भी निकाला जाये। वह लगातार पुलिस अफसर से भी अनुरोध करता रहा कि दूसरे मजदूर को भी निकाला जाये। एक घंटे तक इस बुर्जुग मजदूर के शोर मचाने पर प्रशासन ने उसके बातों पर ध्यान नहीं दिया और गड्ढे में और मिट्टी गिरा दी। अचानक वह बुजुर्ग कहीं चला गया या उसे गायब कर दिया गया। उसकी जगह पर एक नौजवान आया जिसके शरीर पर न तो कहीं मिट्टी लगी थी और न ही उसके कपड़े गंदे थे। वह कहने लगा कि मैं भी उसी के साथ काम कर रहा था और दोनों भागने में सफल रहे और केवल एक मजदूर ही दबा था। इस तरह एक मजदूर की मौत रहस्य बन कर रह गया। इस साईट की न तो यह पहली घटना है न ही अंतिम। इससे पहले भी अनेक घटनाएं घट चुकी हैं। कुछ समय पहले बिजली के करंट से एक मजदूर की मौत हो चुकी है और न जाने कितने मौत रहस्य बन कर ही रह गये होंगे।
यह केवल सेक्टर 75 की ही घटना नहीं है, इससे पहले कितनी मौतें दिल्ली और एनसीआर में हो चुकी है। तीन-चार माह पहले मिट्टी धंसने से ही समयपुर बादली में दो मजदूरों की मौत हो चुकी है। कंस्ट्रकशन साइट पर इस तरह की घटनाएं आम हो चुकी हैं। दिल्ली एनसीआर में ही नहीं देश के विभिन्न हिस्सों में रोज व रोज मजदूरों की मौत होती है। साइट पर मजदूरों की सुरक्षा का ध्यान नहीं रखा जाता है और उनके बचाव के उपकरण से उनको और जोखिम होता है, जैसा कि याकूब को निकालते समय जे.सी.बी. ने जख्मी कर दिया।  वो जिन्दा भी रहे हांे लेकिन सिर पर चोट लगने से तो मौत लाजमी है। इसी तरह की घटना 23 फरवरी, 2015 को बंगलोर के एलिमेंट्स  माल के सामने हुई। एलिमेंट्स  माल के समाने सीवर बिछाने का काम किया जा रहा था जिसमें मनोज दास और हुसैन मिट्टी में दब गये। उनको जे.सी.बी मशीन से निकाला गया जिसके कारण एक के हाथ और दूसरे के पैर में फ्रैक्चर हो गया। अस्पताल में मनोज का दायां हाथ काटना पड़ा।



150 बिल्डरों पर करोड़ों रूपये का लेबर सेस बाकी है। इस टेबल में कुछ बिल्डरों के ऊपर बकाया लेबर सेस दर्शाया गया है -
बिल्डर का नाम                  बकाया राशि रुपये में
सुपर टेक ग्रुप                 182065983
अम्रपाली ग्रुप                  123710638
यूनिटेक ग्रुप                    48060370
अंजरा ग्रुप                       6934059
लीजिकस ग्रुप                  478198925
जेपी ग्रुप                              66063139
सैम इंडिया                       8745314
एम्स मैक्स गारडेनिया डेवलपर्स      89681365
गायत्री इन्फ्रा प्लानर               2294658
गुलशन होम्ज                    3459786
जीपेक्स ड्रीम होम्ज                4088037
टाइमस शापी                    12151623          
एटीएस टाउन शिप                5349510
गौक सन्स                      60635703
सिक्का ग्रीन्स                   10959951
स्रोत: बिल्डर रियलटी
लेबर डिर्पाटमेंट का कहना है कि बिल्डर लॉबी ऊंची रसूख के होते हैं जिसके कारण उन पर कार्रवाई नहीं हो पाती है। जो भी अधिकारी कार्रवाई की कोशिश करता है उसका ट्रांसफर करवा दिया जाता है। मजदूरों की मौत केवल कंस्ट्रकशन के समय ही नहीं होती, उसके बाद भी मजदूर बिल्डिंग को चमकाने में मरते हैं। हर वर्ष हजारों मजदूर घर की डेंटिंग-पेटिंग करते समय मर जाते हैं। 15 सितम्बर, 2015 को पेंट करते समय लालू सिंह व एक अन्य मजदूर रोहणी सेक्टर 16 में गिरकर काल का ग्रास बन गये।
हर साल हजारों मजदूरों की मौत से न तो शासन-प्रशासन की नींद खुलती है और न ही नागरिक समाज, न्यायपालिका, मानवाधिकार संगठन सक्रिय होते हैं। न तो लालू सिंह की मौत पहली है और न ही याकूब की मौत अंतिम। हमें आयरन हील का पात्र अर्नेस्ट याद आता है जो बताता है कि हम जिस छत के नीचे बैठे हैं उससे खून टपक रहा है।

Sunday, June 14, 2015

पाँच कम्पनी के मज़दूरों का डीएम कार्यालय पर धरना

रुद्रपुर (उत्तराखण्ड)। लम्बे समय से जारी दमन-उत्पीड़न के खिलाफ सिडकुल की विभिन्न कम्पनियों के श्रमिकों ने सामूहिक रूप से स्थानीय डीएम कार्यालय पर एक दिवसीय धरना देकर अपना आक्रोश प्रकट किया और जिलाधिकारी को ज्ञापन देकर अवैध रूप से निकाले गये मज़दूरों की कार्यबहाली, माँगपत्रों के निस्तारण, शोषण व दमन खत्म करने आदि की माँग की।
इस अवसर पर आयोजित सभा को सम्बोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि मजदूरों की भारी आबादी आज बेहद मामूली दिहाड़ी पर 12-12 घण्टे खटने को मजबूर है। जहाँ भी मजदूरों ने हक की आवाज उठाई वहीं दमन शुरू हो जाता है। यूनियन बनाना अपराध बन गया है। प्रबन्धन जब चाहे मज़दूरों को निकाल देता है और श्रम विभाग से लेकर पुलिस व प्रशासन तक मालिकों की ही भाषा बोलते हैं।
पारले मजदूर संघ के प्रमोद तिवारी ने कहा कि पारले कम्पनी में साढ़े तीन साल पहले यूनियन बनी तभी से शोषण जारी है और अबतक करीब ढ़ाई सौ स्थाई-अस्थाई मज़दूर निकाले जा चुके हैं। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और श्रम विभाग की प्रबन्धन के खिलाफ रिपोर्टों के बावजूद न्याय मिलने की जगह दमन ही बढ़ा है। स्थिति यह है कि ताजा माँगपत्र पर एएलसी महज ने एक वार्ता की खानापूर्ति करके फाइल डीएलसी कार्यालय भेज दी और डीएलसी ने डेढ़ माह बाद वार्ता की तिथि देकर अपनी पक्षधरता स्पष्ट कर दी है।
रिद्धि सिद्धि कर्मचारी संघ के दरपान सिंह खाती ने कहा कि राॅकेट रिद्धि सिद्धि में विगत डेढ़ साल से माँगपत्र को लेकर औद्योगिक विवाद कायम है और प्रबन्धन तरह-तरह से श्रमिकों का उत्पीड़न कर रहा है। इसी क्रम में पिछले नौ माह से यूनियन पदाधिकारियों सहित 10 श्रमिकों का कथित जाँच के बहाने उत्पीड़न जारी है, चार श्रमिकों का विगत नौ माह से गेट बन्द है। माँगपत्र पर भी प्रबन्धन ने खामोशी बना रखी है।
मित्तर फाॅस्टनर कम्पनी के सुदर्शन कुमार शर्मा ने बताया कि वेतन बढ़ोत्तरी और न्यूनतम सुविधाओं की माँग करने पर प्रबन्धन ने अवैध रूप से चार श्रमिकों की सेवा समाप्त कर दी और दो श्रमिकों को निलम्बित कर दिया। पिछले एक पखवारे से पीडि़त श्रमिक न्याय के लिए कलक्ट्रेट परिसर में धरनारत हैं।
महेन्द्रा यूजिन/सीआईआई कम्पनी के श्रमिक प्रतिनिधि हेम चंद ने बताया कि श्रमिकों ने विगत साढ़े नौ माह पूर्व अपने वेतन व सुविधाओं के सम्बन्ध में माँगपत्र दिया तो वहाँ दमन बढ़ गया। श्रमिक प्रतिनिधियों सहित दो श्रमिकों का अवैध रूप से विगत नौ माह से गेट बन्द है। एएलसी एसडीएम केवल आश्वासन दे रहे हैं।
वोल्टास इम्पलाइज यूनियन के नन्दलाल ने कहा कि यूनियन विगत साढ़े छह माह से अपने माँगपत्र को लेकर संघर्षरत हैं, लेकिन अभी तक कोई समाधान नहीं निकला। ऐसे में संयुक्त रूप से संघर्ष के लिए हमें आगे आना पड़ा है। आगे और भी कारखानों के मज़दूर एकजुट होंगे।
टाटा मोटर्स लि. श्रमिक संघ के अध्यक्ष दिनेश चंद आर्य ने समर्थन देते हुए कहा कि आज सभी कम्पनी के मजदूरों को एकजुट होने की जरूरत है, ऐसे में पाँच कम्पनियों के मजदूरों का यह सामुहिक धरना महत्वपूर्ण है जो हमारी एकता को और आगे बढ़ाएगा। ब्रिटानिया कर्मकार यूनियन के अध्यक्ष दिनेश चंद्र जोशी ने एकता बनाने पर जोर दिया। सीपीआई के जिलामंत्री राजेन्द्र प्रसाद गुप्ता ने कहा कि शोषण के खिलाफ एकजुट संघर्ष ही रास्ता है।
मजदूर सहयोग केन्द्र के कुन्दन सिंह ने कहा कि आज मज़दूर आबादी की एकता कमजोर हुई है जिससे मालिक और ज्यादा हमलावर हुए हैं। सरकार और उसका पूरा अमला मालिकों की सेवा में एक टांग पर खड़ा है। मुकुल ने लम्बे संघर्षों के दौरान हासिल अधिकारों को छीने जाने की चर्चा करते हुए बताया कि मजदूर आबादी को नए व जुझारू संघर्ष के लिए कमर कसना होगा। पूँजी के मुस्तरका हमले को श्रम की एकजुट ताकत से जवाब देना होगा।

Wednesday, May 6, 2015

क्या जेल में बर्बाद हुए दिन लौटेंगे?


तीन साल के संघर्ष के बाद 93 मजदूरों को मिली जमानत
रामनिवास, मारुति सुजुकि प्रोविजनल वजनल कमटी
4 जून 2011 से अब तक मारुति मजदूरों का संघर्ष लगातार जारी है। यह संघर्ष 2011 से यूनियन बनाने की लडाई को लेकर हुआ तो 2012 में यूनियन को स्थापित करने व यूनियन के हकों की लडाई के लिए जारी रहा। 18 जुलाई 2012 से यह संघर्ष यूनियन को बचाने के लिए और जेल में बन्द मजदूरों की रिहाई व बर्खास्त मजदूरों की बहाली के लिए जारी है। लगभग तीन साल से जेल में बन्द मजदूरों की रिहाई के लिए जारी इस लडाई से मजदूरों के लिए एक बात तो साफ हो गई कि शासनप्रशासन, प्रबन्धन, सरकार, पुलिस व न्यायालय
सभी मजदूरों के ‌खिलाफ और पूंजिपतियों के पक्ष में डट कर खडे हैं। इतने लम्बे समय से जेल में बन्द मजदूरों को जमानत के लिए भी दो बार उच्चतम न्यायालय जाना पडा। लगभग तीन साल के बाद निर्दोष होते हुए भी अभी हाल ही में लगभग 93 मारुति मजदूरों को जमानत पर रिहा किया गया है। लेकिन 54 मजदूर अभी भी न्याय की उम्मीद से आस लगाए बैठे हैं। भले ही जेल से कुछ मजदूर जमानत पर रिहा हुए हों लेकिन उनके साथ अन्याय ही हुआ है। चाहे ये मजदूर बाद में बरी भी क्यों न हो जायें लेकिन इनके जीवन के जेल में काटे गये दिन इन्हें अहसास दिलाते रहेंगे कि इनके साथ कितना अन्याय हुआ है। ढेरों मजदूरों के खिलाफ
कोई भी गवाह नहीं है। अदालत में बहुत सारे गवाह ऐसे आए हैं जिन्होंने अपने बयान में कई मजदूरों के नाम लिए हैं जो बताते हैं कि घटना के दिन उन्होंने मारपीट करते हुए देखा था लेकिन अदालत में किसी को भी पहचान नहीं सके। लगभग ऐसे ही पूरा केस झूठ की दीवार पर टिका है और अन्त में सच सबके सामने आ
जायेगा। लेकिन इस झूठे केस से इन सबका जीवन लगभग बर्बाद हो चुका है। क्या जेल में बर्बाद हुए दिन वापस लौटेंगे?
यही हमारे सबसे बडे लोकतंत्र का असली चेहरा है जहां न्याय के लिए जिन्दगियां तबाह हो जाती हैं, जहाँ गुनहगार खुलेआम घूमते है। जहाँ जबरन पैसे की बदौलत गवाह खरीदे बेचे जाते हैं। जहां पर पैसे वाले लोगों की ओर न्याय का तराजू झूक जाता है और गरीब व बेसहारा लोगों के लिए न्याय का देवता अपनी आंखों पर पटटी बांध लेता है। ऐसे कितने ही मजदूर मारुति मजदूरों के साथ साथ गुडगांव व देश भर के मजदूरों के सामने एक सवाल खड़ा कर रहे हैं कि कब तक अपने हकों की लडाई में हम जेल में सड़ते रहेंगे? क्या हमारे
जेल में पडे रहने से अन्य मजदूरों की जिन्दगी प्रभावित हुई है? या सिर्फ हमारे घरों में ही अन्धेरा छाया हुआ है? मजदूर एकता जिन्दाबाद व दुनिया के मजदूरों एक हो जैसे नारे लगाने वाले मजदूरों के सामने खुद ही ये सवाल है कि ये बातें नारों से निकलकर धरातल पर कब दिखाई देगीं? आज मारुति सुजुकि के चारों प्लांट एकजुट होकर ‘‘मारुति सुजुकि मजदूर संघ‘‘चला रहे हैं। सभी ने चारों प्लांट की समस्याओं को हल करने व एकजुटता के लिए ये फैडरेशन बनाया है। यह एक हद तक काफी सराहनीय कदम है। सबने अभी हाल ही में अपना मांगपत्र दिया है और जेल में बन्द मजदूरों व बर्खास्त मजदूरों की बहाली की मांग को प्रमुखता से रखा है। वहीं कम्पनी प्रबन्धन भी अपनी रणनीति बनाने में जुटा है और इस एकता को तोड़ने की कोशिशें कर रहा है। सैटलमेंट को कमजोर करने के लिए व यूनियन प्रतिनिधियों पर मानसिक दबाव बनाने के लिए कम्पनी प्रबन्धन ने सिविल कोर्ट गुडगांव में 1000 मीटर दूरी तक स्टे आर्डर के लिए याचिका दायर की है। पहले भी मारुति प्रबन्धन ने आवाज दबाने के लिए यही किया और 18 जुलाई की घटना को अंजाम देकर यूनियन प्रतिनिधियों के साथ सैकडों मजदूरों को जेल में डलवा रखा है और हजारों को कम्पनी से बर्खास्त कर रखा है। यही षड्यन्त्र प्रबन्धन अभी भी रच रहा है। इससे बाहर आने के लिए मारुति संघ को अपनी एकता को और
मजबूत करते हुए इलाकाई एकता कायम करनी होगी और सभी मजदूरों से मदद लेनी होगी।
हमने इस संघर्ष को लडने का संकल्प लिया और हम अपनी ताकत के बल पर लड़ भी रहे हैं। लेकिन हम मजदूरों के सामने सबसे बडी समस्या पूंजीपति नहीं बल्कि हमारे अपने ही मजदूर साथी हैं। ऐसे कितने ही मजदूर नेता आज हम गुडगांव क्षेत्र में देखते हैं, जो जब तक कार्यरत थे तब तक सभी मजदूर उन्हें मसीहा मानते थे। आज तमाम मजदूर उनसे आंख बचाकर निकल जाना ही उचित समझते हैं। यह भी एक बहुत बडा कारण है कि हमारे नेता कम्पनी की ओर आकर्षित हो जाते हैं। हमें इस चुनौती को समझना होगा कि वो जो मैदान से किसी कारणवश चले जाते हैं उनका अनुभव भी बेहद महत्वपूर्ण होता है। और यह भी समझना चाहिए कि जब बकरी और शेर एकसाथ एक ही घाट पर पानी पीने लग जाएं तो जंगल या राजा खतरे में है। बस हमें जरुरत है तो संघर्षरत साथियों को मजबूत और एकजुट करने की।