Thursday, February 23, 2017

207 फुटे झण्डे के पीछे का Logic ..


मित्रों आओ आपको व्यापार सिखाते हैं। आजकल 70 फीट से लेकर 207 फीट तक की ऊंचाई के तिरंगे फैशन में हैं। क़ीमत पचास लाख से लेकर डेढ़ करोड़ रुपये तक। इतनी ऊंचाई पर कपड़े का झंडा नहीं रुक सकता सो ढाई से पांच लाख रुपये का पैराशूट मैटेरियल का झंडा। इतने पर भी एक झंडे की उम्र तीन से लेकर पंद्रह दिन। अब चूंकी फ्लैग कोड कहता है कि ख़राब झंडा फहराना जुर्म है सो झंडे को औसतन पंद्रह दिन में बदला जाना ज़रूरी। यहां तक सब ठीक है। मगर मुद्दा ये है कि इतने सारे झंडे किसने लगाए और इनको मेंटेन कौन कर रहा है। दिल्ली का एक गुमनाम सा वैंडर है फास्ट ट्रैक इंजीनियरिंग। एक जैन साहब इसके सर्वेसर्वा हैं। देश भर में ये फर्म क़रीब डेढ़ सौ झंडे लगा चुकी है। पहला झंडा कनॉट प्लेस में नवीन जिंदल की फ्लैग फाउंडेशन ने लगवाया। इसके बाद देश के लगभग सारे नगर निगम, राज्य सरकारें और निजी व्यवसाई इसे लगवा चुके हैं। ताज़ा फरमान विश्वविद्यालयों में लगवाने के लिए केंद्रीय शिक्षामंत्री का है। इस से पहले बीजेपी सांसदों को बुलाकर फरमान सुनाया गया था कि वो सांसद निधि से ये झंडे लगवाएं। कई प्राईवेट कॉलेजों पर भी ये झंडा लगवाने का दबाव है। सरकारी धन से लग रहे झंडों पर तो लोग कुछ नहीं कहते मगर प्राईवेट वालों के लिए परेशानी है। इस तो सबको एक ही वैंडर से लगवाना है जो केंद्र सरकार का ख़ास है... उसके लिए मुंह मांगी क़ीमत भी दो और सालाना मेटिनेंस का क़रार भी करो। अगर हर पंद्रह दिन में झंडा ख़राब हो रहा है तो साल भर में सिर्फ झंडा बदलवाई ही साठ लाख रुपये है ऊपर से दो आदमियों की तनख़्वाह अलग। लगवाते वक्त एकमुश्त भुगतान तो वाजिब है ही। नगर निगमों के पास अपने कर्मियों को तनख्वाह देने के पैसे नहीं हैं मगर सालना का एक करोड़ का ख़र्च सरकार ने फिक्स करा दिया है। अब ये मत पूछना कि इसने कितना राष्ट्रवाद है और कितना व्याापार। बस पता कीजीए सज्जन जिंदल का सरकार से क्या रिश्ता है और उनकी पाईप बनाने की फैक्ट्री का इन झंडों से क्या लेना देना है। बाक़ी सांसद निधि, नगर निकायों के धन से आपका हो न हो छदम राष्ट्रीयता और पूंजीवाद का विकास तो हो ही रहा है। सरकारें ऐसे ही चलती हैं... बाक़ी मेक्यावेली चचा काफी कुछ समझा गए हैं। तो ज़ोर से मेरे साथ नारा लगाईए... जय हिंद, जय राष्ट्रवाद... वंदे मातरम... वंदे पूंजीवादी पितरमं... Sunil Gopal की वाल से साभार

Tuesday, February 21, 2017

Narendra Modi is as Manmohan singh for workers

There was about 250 small units of silver work in Jaunpur city of uttar pradesh before 1990. After new economic policy implemented in india by Manmohan singh, now in 2017 only 10 units are running. More than 5000 poor labour unemloyed, but no party come in favour of small scale industries and laboures of small cities, towns and villages. PM Narendra Modi is best fallower of Manmohan singh. He is implementing his Big corporate favouring policy very strictly. After 5 years we will find that thousands of small scale industries destroyed. Then People will find Modi same as Manmohan had done very cleaverly in past. In beginning of this year i was in Jaunpur. I go to understand nature of silver work job. After hole day street by street i find that silver work is finished. Remaining units are in very bad condition. In these units After whole day 12-14 hours working, a labour can hardly earn 50-60 rs against their wage. Demonetisation impact is very deep in this sector. Unit owner is not giving worker's wage in time, because he is also facing payment related problems from his customers.

Sunday, February 12, 2017

आईएस की कथित ‘किल लिस्ट’ कैसे हुई मीडिया में लीक, जवाब दे एनआईए- रिहाई मंच

लखनऊ। रिहाई मंच ने एनआईए द्वारा आतंकी संगठन आईएस के कथित ‘किल लिस्ट’ के मीडिया में आने पर सवाल उठाया है। मंच ने कहा कि खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के साथ काम करने वाले हैकरों की कथित हत्या वाली लिस्ट का मीडिया में आना साबित करता है कि एजेंसियां आतंकवाद से लड़ने से ज्यादा उसका प्रोपागंडा करने में दिलचस्पी रखती हैं। रिहाई मंच प्रवक्ता शाहनवाज आलम ने कहा कि आईएस की कथित ‘किल लिस्ट’ का मीडिया में आने पर एनआईए खुद कटघरे में खड़ी हो जाती है। क्योंकि ऐसी लिस्ट में जिन लोगों के नाम शामिल बताए जा रहे हैं उनकी सुरक्षा प्राथमिकता में होनी चाहिए थी न कि उस लिस्ट से जुड़ी अपुष्ट खबर को चुनिंदा अखबार के माध्यम से प्रसारित कर एक पूरे समुदाय को बदनाम करना होना चाहिए था। उन्होंने कहा कि खबर को जिस तरह कथित सूत्रों के हवाले से प्रसारित करवाया गया उससे यह संदेह मजबूत होता है कि एजेंसी ने आतंकवाद का हौव्वा खड़ा करने के राजनीतिक उद्देश्य से खबर चलवाई है जिसके कारण खबर की विश्वसनियता पर भी गंभीर सवाल उठ जाते हैं। शाहनवाज आलम ने कहा कि खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की कार्यपद्धति रही है कि वो आतंकवाद के नाम पर पहले एक जनमत मुस्लिम समुदाय के खिलाफ मीडिया की अपुष्ट खबरों द्वारा बनाती हैं। मडिया में आई इस कथित ‘किल लिस्ट’ से यह साबित होता है कि एनआईए को लेकर जो एक आम धारणा बन चुकी है कि वह आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह पढ़े लिखे खास तौर पर तकनीकी तौर पर दक्ष मुस्लिम नौजवानों को फंसाती है, को बदलने की रणनीति के तहत तकनीकी तौर पर दक्ष बहुसंख्यक समुदाय के युवकों को आईएस की हिट लिस्ट में दिखाना चाहती है। ताकि वह समाज में इस भ्रम को फैला सके कि आईएस के नाम मुस्लिम समुदाय हिंदू समाज पर हमलावर है। रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने सुनील जोशी हत्या कांड के आरोप से बरी की गईं साध्वी प्रज्ञा के मामले में फैसले के खिलाफ अभियोजन पक्ष द्वारा अपील करने से पीछे हटने को कानून का मजाक कहा है। उन्होंने कहा कि जब खुद फैसले में इस बात को कहा गया है कि जांच एजेंसियों ने जानबूझकर कमजोर और अन्र्तविरोधी सुबूत रखे ताकि मुकदमा कमजोर हो जाए तब कानून का तकाजा यही था कि इस पूरे मामले की दोबारा जांच कराई जाती। उन्होंने कहा कि ऐसे फैसले न सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करते हैं बल्कि जांच एजेंसियों के सांप्रदायिक चरित्र को उजागर करते हैं जिसके खिलाफ खुद सुप्रिम कोर्ट को संज्ञान लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक तरफ एनआईए आतंक के आरोपों में मुस्लिम बेगुनाहों को फंसाने के लिए काल्पनिक तथ्य गढ़कर उनका जीवन नष्ट कर देती है जो अंत में अदालतों द्वारा बरी किए जाते हैं। लेकिन संघ परिवार से जुड़े हिन्दुत्वादी आतंकियों के मामले में एनआईए अधिकारी कभी लोक अभियोजक रोहनी सैलियन पर खुद केस कमजोर करने का दबाव डालते हैं तो कभी सारे गवाहों को खुद होस्टाइल करवा देते हैं और खुद इतनी कमजोर पैरवी करती हैं कि जज को भी अपने फैसले में इस पर टिप्पड़ी करना पड़ जाता है। राजीव यादव ने आरोप लगाया कि एक तरफ तो अशफाक मजीद जैसे मुस्लिम युवक को रेडिकलाइज करने के आरोप में तीन मुस्लिम युवकों रिजवान खान, मोहम्मद हनीफ और अरशी कुरैशी पर मुकदमा इस आधार पर लाद दिया है कि वो लोग उसे आईएस से जुड़ी वीडियो दिखाते थे। तो दूसरी तरफ साध्वी प्रज्ञा से जुड़ा मामला है जिनकी तस्वीर खुद गृहमंत्री राजनाथ सिंह और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान के साथ है लेकिन एनआईए ने इन दोनों नेताओं से आज तक कोई पूछ-ताछ तक नहीं की है उन्हें आरोपी बनाना तो दूर। द्वारा जारी शाहनवाज आलम प्रवक्ता रिहाई मंच 9415254919

Sunday, February 5, 2017

वेलेंटाइन डे और भगतसिंह को फाँसी की सजा का संघी कुत्साप्रचार

पिछले कुछ वर्षों से वेलेंटाइन डे के दिन संघ अपने परम्परागत तरीके मार पिटाई के अलावा विरोध का एक ओर तरीका प्रयोग में ला रहा है। उसने इस दिन को किसी ओर दिन के रूप में पेश करने की भी कोशिश शुरू कर दी है। संघ के कुछ लोग इस दिन मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाने की वकालत करते हैं तो कुछ ये प्रचार कर रहे हैं कि इस दिन 1930 में शहीद भगतसिंह और उनके साथियों को फाँसी की सजा सुनाई गई थी। शुरूआती कुछ सालों में तो ये बेशर्मी से इसी दिन को भगतसिंह को फाँसी की सजा देने की तारीख बताते थे पर बाद में इनका ये झूठ जब चला नहीं तो इन्होने ये प्रचार चालु किया कि इस दिन उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी। इतिहासबोध से रिक्त मध्यम वर्ग के बीच इस प्रचार का अच्छा खासा प्रभाव भी हो चुका है। यहां तक कि एक अख़बार राजस्थान पत्रिका ने तो बाकायदा इसको एक बड़ी सी तस्वीर के साथ शेयर किया है। जैसी की आशा थी, उस पोस्ट को लाखों लाइक और शेयर भी मिल गये। हकीकत ये है कि भगतसिंह के केस का ट्रायल ही 5 मई 1930 में शुरू हुआ था। 7 अक्टूबर 1930 को उन्हें फांसी की सजा का ऐलान हुआ व 23 मार्च 1931 को फाँसी दे दी गई। अब सवाल ये उठता है कि संघ ने भगतसिंह की शहादत को ही इस अफवाह के लिए क्यों चुना? शहीद भगतसिंह ने अपने जीते जी साम्प्रदायिकता की राजनीति का जमकर विरोध किया, देश के गरीबों, मेहनतकशों को क्रान्ति के लिए एकजुट होने का आह्वान किया। नौजवानों को क्रान्ति का सही रास्ता दिखाया। ऐसे में शहीद भगतसिंह की विचारधारा से संघ आज भी खौफ खाता है। उनकी किताबों के दर्शन मात्र से संघी कार्यकर्ताओं की हालत खराब हो जाती है। लेकिन शहीद भगतसिंह आज भी देश के युवाओं के बीच लोकप्रिय हैं, संघ के लिए ये सम्भव नहीं है कि उनके विरूद्ध कोई कुत्साप्रचार कर सके। इसलिए संघ ने बीच का रास्ता निकाला है कि शहीद भगतसिंह की जिन्दगी से जुड़े तथ्यों से छेड़छाड़ की जाये। इससे वो एक तीर से दो निशाने लगा सकते हैं, एक तो अपने आप को इन शहीदों से जोड़ लेते हैं, दूसरी ओर इसी बहाने अपने वेलेंटाइन डे के विरोध को भी जायज ठहरा देते हैं। हालिया कुछ वर्षों में मध्यम वर्ग के नौजवानों के बीच अपना आधार बढ़ाने के लिए भी संघ सीधे तौर पर मार-पिटाई (खासकर महानगरों में) के तरीकों की जगह ऐसे कुत्साप्रचार के हथकण्डे आजमा रहा है। एक झूठ को सौ बार बोलकर सच साबित करने की नीति पर काम करते हुए पिछले कुछ वर्षों में इन्होने इस तथ्य को आम नौजवानों के बीच पैठा भी दिया है। इसलिए गोएबल्स शैली के इस झूठ का पर्दाफाश जरूरी है। ना सिर्फ शहीदे-आज़म भगतसिंह की विचारधारा की रक्षा के लिए बल्कि इतिहासबोध की रक्षा के लिए भी। (व्‍हाट्स एेप पर फ्रं‌टियर की वाल से)

Friday, February 3, 2017

अपहरण-हत्या को अखिलेश मानते हैं जनहित और न्यायहित- रिहाई मंच

लखनऊ। रिहाई मंच ने अखिलेश सरकार पर अपराधी व माफिया नेताओं को संरक्षण देने का आरोप लगाते हुए कहा कि कहां तो सरकार ने बेगुनाहों को रिहा करने का वादा किया था वहीं उसने पांच साल के कार्यकाल में 19 अपराधी और माफिया नेताओं पर से ‘जनहित और न्याय हित’ में मुकदमा वापस ले लिया है। मंच ने कहा कि एक तरफ हाशिमपुरा के इंसाफ, भोपाल फर्जी मुठभेड़ का सवाल उठाने पर रिहाई मंच के नेताओं पर मुकदमा कायम किया जाता है तो वहीं दूसरी तरफ मुजफ्फरनगर के दंगाई संगीत सोम और सुरेश राणा पर से रासुका हटाई जाती है। रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि अखिलेश यादव को बताना चाहिए कि हत्या, डकैती, अपहरण जैसे संगीन आरोपों में निरुद्ध नेताओं पर से मुकदमा हटाना किस तरह का जनहित और न्याय हित है। उन्होंने कहा कि सपा सरकार ने अपने पांच साल के शासन में न्याय हित और जन हित की पूरी परिभाषा ही बदल दी। एक तरफ जहां आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को रिहा करने के वादे से सरकार मुकर गई तो वहीं जो अदालतों द्वारा बरी भी किए गए उन्हें भी दुबारा जेल भेजने के लिए अपील कर दिया। इसी तरह सोनभद्र के कनहर और कानपुर देहात के नेवली थर्मल पावर प्रोजेक्ट में अपनी जमीन के मुआवजे के लिए लड़ रहे किसानों पर मुकदमा कर दिया। अखिलेश यादव और उनसे नाराज बताए जा रहे उनके पिता मुलायम सिंह को बताना चाहिए कि लोहिया ने अपने किस भाषड़ में गुण्डा और माफिया तत्वों पर से मुकदमा हटाने और किसानों पर मुकदमा कायम करने की बात कही थी। जिसके तहत उन्होंने रघुरात प्रताप सिंह, राम शंकर कठेरिया, कलराज मिश्रा, अभय सिंह, भगवान शरण उर्फ गुड्डू पंडित, विजमा यादव, विजय मिश्रा, हरिओम यादव, मनबोध प्रसाद, कैलाश चैरसिया, विनोद कुमार उर्फ पंडित सिंह, राममूर्ति वर्मा, सुरेन्द्र सिंह पटेल, ब्रम्हा शंकर त्रिपाठी, राकेश प्रताप सिंह, मित्रसेन यादव, इरफान सोलंकी, सतीश निगम, रविदास मेहरोत्रा पर से मुकदमा हटा लिया। मंच अध्यक्ष ने कहा कि अखिलेश यादव को बताना चाहिए कि उनका समाजवाद हाशिमपुरा जनसंहार और भोपाल फर्जी मुठभेड़ का सवाल उठाने वाले रिहाई मंच को क्यों बर्दाश्त नहीं कर पाता और उन पर पुलिसिया दमन करते हुए मुकदमा दर्ज कर लेता है। लेकिन उसे मुजफ्फरनगर के दंगाईयों संगीत सोम और सुरेश राणा पर मुकदमा बर्दाश्त नहीं होता और वो उन पर से रासुका तक हटा लेती है। मुहम्मद शुऐब ने कहा कि अखिलेश यादव का पूरा पांच साल का कार्यकाल अपने पिता मुलायम सिंह की ही लाईन पर चला। उन्होंने भी बाबरी मस्जिद को तोड़ने का षडयंत्र करने वाले आडवानी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा को रायबरेली कोर्ट में क्लीन चिट दिलवाया तो वहीं अखिलेश यादव ने मुसलमानों की गर्दन काटने का खुलेआम ऐलान करने वाले वरुण गांधी को क्लीन चिट दिलवाया। द्वारा जारी शाहनवाज आलम प्रवक्ता रिहाई मंच 9415254919

Thursday, January 19, 2017

PROVIDE SOCIAL SECURITY COVER TO SCHEME WORKERS: CITU

Srinagar, January, 19: Centre of Indian Trade Unions(CITU), J&K as a part of nation wide programme organized a protest demonstration of Scheme workers functioning in various sectors including Anganwadi workers and helpers, ASHAs(National Health Mission), Mid Day Meal workers and CPWs(Education), casual labourers to pressurize the government to concede their genuine and legitimate demands. Hundreds of demonstrators marching from Lal Chowk, Residency road, holding placards, banners in favour of their demands, hundreds of demonstrators were raising slogans and culminated the protest demonstration Press Enclave Srinagar. Addressing the protestors, Abdul Rashid Najar, Joint Secretary, CITU, J&K impressed upon the government to concede the recommendations made by 45th Indian Labour Conference regarding provision of Rs.18000/- as minimum wages to the scheme workers and labourers working in unorganized sector so that justice is done to his vulnerable section of the society. Mohd.Afzal Parray, senior CITU leader demanded the recent land mark judgment of the Hon’ble Supreme Court in respect of “Equal Pay for Equal Work” be implemented in letter and spirit. Besides, he also exhorted upon the government to provide adequate budgetary allocations for covering this vulnerable section of the society under social security provisions. The representatives of the respective organizations of the scheme workers also addressed the rally. Sd/-(Majid Jehangir, for state committee office)

Friday, December 23, 2016

एक तनख्वाह से कितनी बार टेक्स दूं और क्यों

एक तनख्वाह से कितनी बार टेक्स दूं और क्यों...जबाब है??? मैनें तीस दिन काम किया, तनख्वाह ली - टैक्स दिया मोबाइल खरीदा - टैक्स दिया रिचार्ज किया - टैक्स दिया डेटा लिया - टैक्स दिया बिजली ली - टैक्स दिया घर लिया - टैक्स दिया TV फ्रीज़ आदि लिये - टैक्स दिया कार ली - टैक्स दिया पेट्रोल लिया - टैक्स दिया सर्विस करवाई - टैक्स दिया रोड पर चला - टैक्स दिया टोल पर फिर - टैक्स दिया लाइसेंस बनाया - टैक्स दिया गलती की तो - टैक्स दिया रेस्तरां मे खाया - टैक्स दिया पार्किंग का - टैक्स दिया पानी लिया - टैक्स दिया राशन खरीदा - टैक्स दिया कपड़े खरीदे - टैक्स दिया जूते खरीदे - टैक्स दिया कितबें ली - टैक्स दिया टॉयलेट गया - टैक्स दिया दवाई ली तो - टैक्स दिया गैस ली - टैक्स दिया सैकड़ों और चीजें ली ओर - टैक्स दिया, कहीं फ़ीस दी, कहीं बिल, कहीं ब्याज दिया, कहीं जुर्माने के नाम पर तो कहीं रिश्वत के नाम पर पैसा देने पड़े, ये सब ड्रामे के बाद गलती से सेविंग मे बचा तो फिर टैक्स दिया---- सारी उम्र काम करने के बाद कोई सोशल सेक्युरिटी नहीं, कोई पेंशन नही (5 साल के MP, MLA रहे तोऔर बात है), कोई मेडिकल सुविधा नहीं, बच्चों के लिये अच्छे स्कूल नहीं, पब्लिक ट्रांस्पोर्ट नहीं, सड़कें खराब, स्ट्रीट लाईट खराब, हवा खराब, पानी खराब, फल सब्जी जहरीली, हॉस्पिटल महंगे, हर साल महंगाई की मार, आकस्मिक खर्चे व् आपदाएं , उसके बाद हर जगह लाइनें।।।। सारा पैसा गया कहाँ???? करप्शन में , इलेक्शन में , अमीरों की सब्सिड़ी में , माल्या जैसो के भागने में अमीरों के फर्जी दिवालिया होने में , स्विस बैंकों में , नेताओं के बंगले और कारों मे, और हमें झण्डू बाम बनाने मे। अब किस को बोलूं कौन चोर है??? आखिर कब तक हमारे देशवासी यूंही घिसटती जिन्दगी जीते रहेंगे????? मै जितना देश और इस पर चिपके परजीवियों के बारे मे सोचता हूँ, व्यथित हो जाता हूँ। समय आ गया है कि किसी की भक्ति से बढ़ कर देश व देशवासियों के बारे मे सोचें । (कमलेश उपाध्याय के फेसबुक पेज से)